वादों का यह दौर है, पोषित करता वाद
लोकतंत्र मजबूर पर, जाति-पन्थ आबाद
जाति-पंथ आबाद, देश दुनिया सब पीछे
करता बन्दर बाँट, भूप आँखों को मीचे
'सतविंदर' न प्रभाव, रहा मीठे नादों का
क्रूर किस्म का जोर, और झूठे वादों का।
ठहरा हुआ समय "क्या जमाना आ गया है!" स्वभाविक शिकायती अंदाज में बस की सीट पर बगल में बैठे वृद्ध बारू राम बड़बड़ाया। "क्या हो गया बाबा? जमाने से क्या शिकायत हो गई अब?", नवीन ने चुटकी ली। "बेटा! मैं आजकल के समय की बात कर रहा हूँ।" "जी, समझ गया सब।" नवीन ने रूखा-सा जवाब दिया। और चुप बैठ4 गया। यह बात बारू राम को न पची और वह बोल उठा, " हम चिट्ठी-पत्री से भी पहले के ज़माने देख चुके हैं।" "तो?" "कई-कई दिन में सन्देश मिलते थे।" "आज तो सेकंड्स में सन्देश यहाँ से अमरीका पहुँच जाता है।" "जानता हूँ। हम पैदल, बलगाड़ी या साइकिल पर ज़्यादातर सफ़र किया करते।" "अब तो घर-घर बाइक है, कार भी है ही, और आदमी की औक़ात हो तो क्या समुद्र, क्या जमीन और क्या हवा, अंतरिक्ष में भी घूम कर आ सके है।" "पता है बेटा, यह भी। पहले आदमी बहुत मेहनत किया करते।" "अब तो मशीनों और कंप्यूटर ने सारे काम आसान कर दिए। बहुतेरे काम तो कई की जगह एक ही आदमी कर लेता है। बहुत समय बच जाता है।" नवी...
परिस्थितियाँ समयानुसार बदल जाया करती हैं। यह उक्ति प्रत्येक के व्यक्तिगत जीवन के संदर्भ में फिट बैठती है। अन्यथा सामुदायिक या सामाजिक परिदृश्य में तो कुछ परिस्थितियाँ ज्यों कि त्यों बनीं रहती हैं। यदि बचपन की बात की जाए तो यह कई रूपों में नज़र आ जाता है। ऐसा लम्बे समय से हम देखते आए हैं। ढाबों पर, दुकानों पर, सड़कों पर काम करता बचपन; पेन, गुब्बारे, खिलौने बेचता बचपन; रेल गाड़ियों में, बसों में, धर्मस्थलों पर भीख माँगता बचपन; अभिभावकों की महत्वकांक्षाओं के लिए भारी भरकम बस्तों से लदा बचपन। इनमें से कुछ हालात ज़रूरी हैं, कुछ मजबूरी और कुछ दोनों। ख़ैर, आजकल अधिकतर जागरुक अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा पर ज़ोर रखते हैं। कुछ अधिक जागरुक उन्हें खेल या अन्य अकादमियों में भी भर्ती करवा देते हैं। लेकिन सामान्यतः निम्न मध्यमवर्गीय या मध्यमवर्गीय परिवारों में बच्चे अपने पुश्तैनी धन्धें की भी सीख लेते ही चलते हैं। यही हमारे मामले में रहा। किसानपुत्र होने के नाते हमारा बचपन भी किसानी और पशुपालन कार्यों से अछूता नहीं रहा। होश संभालने पर विद्यालय से आने के बाद और छुट्टी के दिनों...
कुण्डलियाँ अच्छे कामों का सखे!, करना सदा प्रचार उनकी तुम तारीफ़ को, सदा रहो तैयार सदा रहो तैयार, गलत को भी तो टोको जो करता सद्कार्य, पीठ उसकी ही ठोको 'सतविंदर' उद्गार, करो यह बिन दामों का खोले सेवा द्वार, बयां अच्छे कामों का। देख्या सै हमनै भई, होवै गुण की खान देसी खाण्या की रहा, सदा बाजरा शान सदा बाजरा शान, ठंड खिचड़ी तै हारै साथ मिलै जब शीत, राबड़ी गर्मी मारै 'सतविंदर' रै ठीक, लावणी का लेखा सै इसतै मिलै अनाज, जमाने नै देख्या सै। शीत:लस्सी राबड़ी: लस्सी व भुने हुए बाजरे से बना शीतल पेय लावणी: फसल कटाई मोटर घर में ही खड़ी, चलने में है फेल मुँह टेढ़ा कर कह रही, जरा खरीदो तेल जरा खरीदो तेल, दिखाओ हिम्मत थोड़ी या दो मुझको बेच, खरीदो कोई घोड़ी सतविंदर कह घास, नहीं वो जिसको ले चर तो साईकिल लो साथ, निकालो घर से मोटर। कुदरत की भी मार नै, झेलै भई किसान शासन कुछ कद सोचता, कद सोचै भगवान कद सोचै भगवान, करै सब ऊँट-मटिल्ला पाणी मैं ज्या डूब, फसल पाक्की का किल्ला सतविंदर सब आस, मिटी अर हो री दुर्गत कदे रेट दे मार, कदे मारै सै कुदरत। ...
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