वादों का यह दौर है, पोषित करता वाद
लोकतंत्र मजबूर पर, जाति-पन्थ आबाद
जाति-पंथ आबाद, देश दुनिया सब पीछे
करता बन्दर बाँट, भूप आँखों को मीचे
'सतविंदर' न प्रभाव, रहा मीठे नादों का
क्रूर किस्म का जोर, और झूठे वादों का।
"देख रे, भले ही कितनी पढ़ी-लिखी हो, प्राइबेट स्कूल में नौकरी करन तो बहू भेजी न जावै म्हारे पै। हाँ, सरकारी नौकरी लाग जेगी फेर कोई दिक्कत नहीं।" "क्यूँ माँ?" "गाम-गवांड के प्राइबेट स्कूलां मैं बहू मास्टरनी बनेगी तो लोग के कह्वेंगे? कि थोड़े-से पैस्या खातर हमनै बहू तै नौकरी करवानी शुरू कर दी। ना भाई मैं इसा न होने दूँगी।" माँ ने जैसे ही आज उसकी पत्नी की नौकरी को लेकर बात छेड़ी, उसे अपनी शादी के कुछ माह बाद माँ द्वारा दी गयी हिदायत याद हो आयी। तब संकोचवश वह भी कुछ न कह पाया था और उसकी नई-नई ब्याहता पत्नी भी, जबकि वह खुद भी एक निजी विद्यालय में शिक्षक है। "के सोचण लाग ग्या बेटा, मेरी बात का जवाब नहीं दिया?" "माँ, इसी बारे में सोच रहा था। उस टैम तो तू घणी करड़ी होगी। म्हारी एक न सुनी तने।" "बेटा, लोकलाज अर कैदे का ख्याल रखना पड़ै है। उस टैम जो बात सही थी मनै वही कही थी।" माँ ने समझाने का प्रयास किया। "अब उसके उलट बात क्यूकर सही हो गई माँ, आज भी गाम-गवांड तो वही है अर लोग भी वें ही?" "अरे, फालतू बकर-बकर ना करे।" , माँ...
ठहरा हुआ समय "क्या जमाना आ गया है!" स्वभाविक शिकायती अंदाज में बस की सीट पर बगल में बैठे वृद्ध बारू राम बड़बड़ाया। "क्या हो गया बाबा? जमाने से क्या शिकायत हो गई अब?", नवीन ने चुटकी ली। "बेटा! मैं आजकल के समय की बात कर रहा हूँ।" "जी, समझ गया सब।" नवीन ने रूखा-सा जवाब दिया। और चुप बैठ4 गया। यह बात बारू राम को न पची और वह बोल उठा, " हम चिट्ठी-पत्री से भी पहले के ज़माने देख चुके हैं।" "तो?" "कई-कई दिन में सन्देश मिलते थे।" "आज तो सेकंड्स में सन्देश यहाँ से अमरीका पहुँच जाता है।" "जानता हूँ। हम पैदल, बलगाड़ी या साइकिल पर ज़्यादातर सफ़र किया करते।" "अब तो घर-घर बाइक है, कार भी है ही, और आदमी की औक़ात हो तो क्या समुद्र, क्या जमीन और क्या हवा, अंतरिक्ष में भी घूम कर आ सके है।" "पता है बेटा, यह भी। पहले आदमी बहुत मेहनत किया करते।" "अब तो मशीनों और कंप्यूटर ने सारे काम आसान कर दिए। बहुतेरे काम तो कई की जगह एक ही आदमी कर लेता है। बहुत समय बच जाता है।" नवी...
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