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कलमगोई किस्से बहुत माँगती है- ग़ज़ल

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ये तकलीफ रिश्ते बहुत माँगती है कलम गोई किस्से बहुत माँगती है भले टेढ़ी बातों में फँसती है जनता  ये उत्तर तो सादे बहुत माँगती है टिकी फितरतें झूठ पर जिसकी सारी वो वादे पे वादे बहुत माँगती है बड़ी बातें साहब बनाते रहे हो सियासत है जुमले बहुत माँगती है करो दफ्न ग़ैरत मरी जो तुम्हारी *खुली कब्र मुर्दे बहुत माँगती है।* जरा रुक के देखो सुनो कुछ हमें भी मुहब्बत है लम्हे बहुत माँगती है। ©सतविंद्र कुमार राणा

राजनीति का भूत-संस्मरण

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बात उस समय की है जब पाँचवीं कक्षा में पढ़ते थे। कक्षा में पढ़ने में सबसे होशियार हम दो लड़के थे। दोनों  ही लगभग एक समान ही अंक प्राप्त करते थे, हर टेस्ट में। उस समय विद्यालय में महिला अध्यापक को बहनजी कहते थे। हमारी बहनजी थी रौशनी बहनजी। उन्होंने मुझे कक्षा का मॉनिटर नियुक्त किया हुआ था। दूसरा जो लड़का था उसके साथ एक अन्य लड़के की जरा ज्यादा नजदीकियाँ बन गई थी। उसका और इसका क्रमांक साथ-साथ थे और वह पढ़ने में थोड़ा कमजोर था, शायद इस लिए। होशियार विद्यार्थियों के फैन जरा ज्यादा ही होते हैं। एक दिन हमारी बहनजी नहीं आई तो मैंने अगली गणित प्रश्नावली के सूत्र और सवाल कक्षा को बोर्ड पर समझा दिए। उसके बाद बहनजी भी मुझे ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करने लगी। पहले तो मॉनिटर का पद और फिर ये सम्मान मिलने पर मेरी और उन दोनों के बीच बिना दिखने वाली दूरी-सी बन गई। मुझे लगने लगा कि वो मुझसे जलते हैं। मैंने इस बात की घोषणा भी कक्षा में ही कर दी। मुझे कहीं से पता चला की कहीं विद्यार्थियों में वोट पड़े और उनमें से दो विद्यार्थियों में एक को बहुत सारे वोट मिले और वह जीत गया। शायद किसी कॉलेज के इलेक्शन का जिक्र...

कायदा मतलब का (लघुकथा)

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"देख रे, भले ही कितनी पढ़ी-लिखी हो, प्राइबेट स्कूल में नौकरी करन तो बहू भेजी न जावै म्हारे पै। हाँ, सरकारी नौकरी लाग जेगी फेर कोई दिक्कत नहीं।" "क्यूँ माँ?" "गाम-गवांड के प्राइबेट स्कूलां मैं बहू मास्टरनी बनेगी तो लोग के कह्वेंगे? कि थोड़े-से पैस्या खातर हमनै बहू तै नौकरी करवानी शुरू कर दी। ना भाई मैं इसा न होने दूँगी।" माँ ने जैसे ही आज उसकी पत्नी की नौकरी को लेकर बात छेड़ी, उसे अपनी शादी के कुछ माह बाद माँ द्वारा दी गयी हिदायत याद हो आयी। तब संकोचवश वह भी कुछ न कह पाया था और उसकी नई-नई ब्याहता पत्नी भी, जबकि वह खुद भी एक निजी विद्यालय में शिक्षक है। "के सोचण लाग ग्या बेटा, मेरी बात का जवाब नहीं दिया?" "माँ, इसी बारे में सोच रहा था। उस टैम तो तू घणी करड़ी होगी। म्हारी एक न सुनी तने।" "बेटा, लोकलाज अर कैदे का ख्याल रखना पड़ै है। उस टैम जो बात सही थी मनै वही कही थी।" माँ ने समझाने का प्रयास किया। "अब उसके उलट बात क्यूकर सही हो गई माँ, आज भी गाम-गवांड तो वही है अर लोग भी वें ही?" "अरे, फालतू बकर-बकर ना करे।" , माँ...

जीवन के रंग- नवगीत

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इंद्रधनुष को दिखे चिढ़ाते, जीवन के सब रंग नींव मिली है अच्छी जिसको उस पर खड़ी अटारी कच्ची-सी मिट्टी पर लेकिन लगे झोपड़ी भारी महलों की आहट से ढहती हर कुटिया बेरंग। दाने-दाने पर कर कब्जा गोश्त नोच कर खाए इसकी भूख बड़ी है इतनी भूखे को निपटाए पचे हाजमे की गोली से  दूजा भूखा अंग जर्जर है काया लेकिन यह बालक-सा मन रखती नरम हाड़ होता जब साथी नहीं खेलती थकती  बालपन हो, या हो बुढ़ापा दोनों चाहें संग। ©सतविन्द्र कुमार राणा

रोशनी का वार: नवगीत

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धूल, धूम्र और अँधेरे,  कब तलक रवि को ढकेंगे? टूटना  उनके छलों का, जान लो हर बार होगा। मेघ भूले राह जब- जब सूखता कृषक का सपना खेत को लेकिन खड़ा वह सींचता निज श्वेद अपना कर्म के ही हाथ उसके, भाग्य का फिर तार होगा। ढोंग करे कोई ढोंगी कुछ समय तक जीतता है सत्य किरण पर है आती यह समय जब बीतता है है तमस की हार निश्चित, रोशनी का वार होगा। कंटकों से भरा है  ये मार्ग जो अब दिख रहा है लेकिन इसका राही ही इक इबारत लिख रहा है   समझ के संग हौसले से  मार्ग ऐसा पार होगा। ©सतविन्द्र कुमार राणा

फाइदा खुद का भी देखकर हो गए- ग़ज़ल

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फ़ायदा खुद का भी देख कर हो गए, कुछ इधर हो गए, कुछ उधर हो गए। चश्म तो हैं खुले पर दिखे कुछ नहीं, रास्ते धुंध से तर-ब-तर हो गए। आग से बुझ रही, आग जब पेट की, घी को ले कर खड़े आग पर हो गए। बाग अब लग रहा घोर जंगल कोई, लोभ से फूल सब जानवर हो गए। तोड़ने के सबक सीखते हैं जहाँ वो मकातिब सभी को नज़र हो गए। ©सतविन्द्र कुमार राणा

चलती जीवन गाड़ी

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एक समझ को रखे सँजोए, दूजा रहे अनाड़ी। दो पहिये हम, प्रेम धुरी है,  चलती जीवन गाड़ी। ठंड घेरती जाती इसको, सूनी-सूनी अमराई। आस मिलन की ऐसे लगती, जैसे धूप छिटक आई। पाकर प्रेम तपिश थोड़ी भी, चले जमी हर नाड़ी। पत्थर के रस्ते से बोलो, अब क्या मतलब अपना है। पगडन्डी काच्ची काफ़ी है, आगे जिस पर बढ़ना है। गाँव हमारा रहा ठिकाना, धंधा खेती-बाड़ी। जब दिल में आए हम दोनों, साथ घूमने जाएंगे। दो पहियों की सही सवारी, इसको  हम अपनाएंगे। मैं पहनूँ जैकट सर्दी में, तुम  जर्सी औ साड़ी। ©सतविन्द्र कुमार राणा